Sunday, June 30, 2013

अपने आप में मगन

 
इस बार 
चर्चा थकान की नहीं 
उत्साह की ही करने को 
तत्पर और कटिबद्ध था वह 
अपने आप में मगन 
झूमते हुए 
अंतिम पग धर 
उसने जाना 
उसका सारा उत्साह 
प्रेम है 
श्रद्धा है 
जिसका उद्गम 
अदि अंत रहित में है 
इस तरह 
अपने आप में निहित 
विस्तार की चेतना लिए 
वह खिलखिलाया 
और फिर 
मुस्कुराते हुए 
उसने जाना 
उसका सारा जीवन 
जो इतने आनंद से परिपूर्ण है 
सौगात है 
एके अज्ञात की 
 
अशोक व्यास 
१ जुलाई २ ३

5 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सब कुछ अन्दर है छिपा हुआ,
उत्खनन नहीं करना आता।

Rajesh Kumari said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार८ /१ /१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है।

Anupama Tripathi said...

मुस्कुराते हुए
उसने जाना
उसका सारा जीवन
जो इतने आनंद से परिपूर्ण है
सौगात है
एके अज्ञात की

उस अज्ञात पार ब्रह्मा परमेश्वर की कृपा बनी रहे तभी जीवन मे उजास है ....
सुंदर अभिव्यक्ति ....
आभार।

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर रचना, क्या बात है


उत्तराखंड त्रासदी : TVस्टेशन ब्लाग पर जरूर पढ़िए " जल समाधि दो ऐसे मुख्यमंत्री को"
http://tvstationlive.blogspot.in/2013/07/blog-post_1.html?showComment=1372748900818#c4686152787921745134

रश्मि शर्मा said...

अज्ञात की सौगात....बहुत खूब..

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...