Saturday, February 16, 2013

एक मुस्कान मात्र से


अन्वेषण अनवरत 
कभी अदृश्य 
कभी मुखरित 
एक तार अनंत का 
झंकृत 
तन्मय होने 
अपने मूल स्वर में 
तन-मन के तंतु 
छेड़ छेड़ 
ढूंढता 
एक राग वह 
जिसमें 
अनुनादित हो 
सीमित, असीमित संग 
2
कभी बंशी 
कभी डमरू 
कभी घुँघरू 
और कभी 
एक मौन सा 
निश्चलता में 
सौम्य सुन्दर संगीत 
सार का 
आने जाने से परे 
एक है  
देखना और होना 
3
ओस का भीगापन 
धरती के साथ 
मन पर भी 

 स्निग्ध शीतलता  
खुली सब ग्रंथियां 
एक मुस्कान मात्र से 
छू लेता 
सारी सृष्टि को 
प्यार से जो 
क्या यह 
विद्यमान रहता है 
मेरे ही भीतर 
नित्य निरंतर 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
16 फरवरी 2013

3 comments:

Anupama Tripathi said...

सुंदर ईश्वरीय भाव ....

प्रवीण पाण्डेय said...

भक्ति से पूर्ण..

expression said...

बहुत सुन्दर......

अनु

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...