Wednesday, October 10, 2012

शब्द तो साथ निभाता है


शब्द
कभी माँ की गोद 
कभी प्रेयसी का आँचल 
कभी अश्रु दर्पण 
कभी गंगा जल 

शब्द 
भटकते हुए का सहारा 
डूबती नाव का किनारा 
शब्दों के सामीप्य में 
उत्साह की मंगल धारा 

शब्द 
हमारे होने की पहचान हैं 
मानव का गौरव गान हैं 
श्रद्धा का परचम लेकर 
शब्द परम प्रेम का गान हैं 

शब्द 
गति प्रदाता हैं 
चिरंतन की गाथा हैं 
शेष चाहे निःशेष हो 
शब्द तो साथ निभाता है 


शब्द 
रस का सागर 
या स्वयं रत्नाकर 
जो डूबे सो जाने 
असीम है शब्द की गागर 

शब्द 
अंधकार हटाते हैं 
प्रकाश बन कर आते हैं 
गुरु रूप ये शब्द 
कितनी करूणा दिखाते हैं 
शिष्य बन कर बैठें तो 
सृष्टि का सार बताते हैं 

अभिव्यक्ति का उपहार देकर 
जब वे मौन में लौट जाते हैं 
हम अभिव्यक्ति स्वरुप पर 
अहंकार की मुहर लगाते हैं 

और जब मैं का नगाड़ा बजाते बजाते थक जाते हैं 
फिर से पावन होने भी शब्दों की शरण में ही आते हैं 


अशोक व्यास 
10 अक्टूबर 2012
बुधवार 

2 comments:

Anupama Tripathi said...

सुंदरतम भाव ....!!
आभार ...!!

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही सुन्दर, साथ निभाता हुआ।

सुंदर मौन की गाथा

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