Saturday, August 25, 2012

घोषणा अपने परिचय की

(फोटो- अनिल पुरोहित, जोधपुर )


1

कहाँ से आती है 
यह सघन उदासीनता सी,

पके फल की तरह 
सारे सन्दर्भों से 
अलग होने की अकुलाहट 

अपने उस  परिचय को 
घोषित कर देने की अधीरता 
जो 
पार है हर परिधि के 

2

और फिर यह संशय सा भी 
ठहरा है  देहरी पर 
की 
बोध इस परिचय का 
बदल न जाए 
घोषणा के बाद 

3

सत्य 
यूं तो मुझे नित्य निडर बनाता है 
पर 
सत्य से विलग होने का भय 
न जाने कहाँ से आता है 

4

लो 
अनाव्रत  होकर 
शब्द नदी में करते हुए स्नान 
कर लिया 
रोम-रोम में 
अनंत का आव्हान 

घोषणा अपने परिचय की नहीं 
बस उसकी महिमा की 
कण कण में मुखरित है 
जिसके सृजन- वैभव का गान 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
25 अगस्त 2012





6 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सत्य निडर बनाता है सत्यमार्ग में और प्रवृत्त होने के लिये।

Ashok Vyas said...

dhanywaad Praveenjee Maharaj

शालिनी कौशिक said...

NICE PRESENTATION.THANKS
संघ भाजपा -मुस्लिम हितैषी :विचित्र किन्तु सत्य

Anju (Anu) Chaudhary said...

बेहद उम्दा विचार रचना ....सादर

Rachana said...

wah shbdon ka aesa chamatkar prashansha ke kabil hai
bahut bahut badhai
rachana srivastava

Rakesh Kumar said...

सत्य यूं तो
मुझे नित्य निडर बनाता है
पर
सत्य से विलग होने का
भय
न जाने कहाँ से आता है

अज्ञान का तम जब मन बुद्धि
पर छा जाता है,सत्य से विलग
होने का भय तभी तो आ जाता है.

अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजनशलाकया
चक्षुरुन्मीलितं येन,तस्मैश्री गुरवे नम:

गुरु कृपा है आपपर,फिर आपको कैसा
भय,अशोक भाई.

बहुत अच्छी लगी आपकी घोषणा
अपने अनुपम परिचय की.

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...