Thursday, June 7, 2012

अंतरहित चेतना



उसने बाहें फैला कर 
सहज ही 
नाप दिया विस्तार जगत का 
इतना सारा 
पर इतना ही 

हाँ इतना ही है विस्तार जगत का 
जितना समा जाए तुम्हारी बाँहों में 

अपनी बाँहों में 
अनंत को अलिंगंबद्ध करने के लिए 
बस इतना ही करना है 
छोड़ दो उसे 
जो तुम्हारी बाँहों के फैलाव को 
सीमित कर 
अंतरहित चेतना पर 
खींचता रहता है 
लकीर सीमाओं की 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
7 जून 2012



3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

फैली बाहों में सारा संसार समा जाता है।

Rakesh Kumar said...

आपके दार्शनिक चिंतन का भी जबाब नहीं.

छोड़ दो उसे जो तुम्हारी बाहों के फैलाव को सीमित कर 'अंतरहित चेतना' पर खींचता रहता है लकीर सीमाओं की'

कैसे छोड़े,अशोक जी.

आप पर तो गुरु कृपा है.

Rakesh Kumar said...

बहुत दिनों से कोई पोस्ट नही अशोक भाई.
सब कुशल है न.

आपकी नवीन पोस्ट की प्रतीक्षा में

राकेश

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