Saturday, April 28, 2012

तुम्हारे पार





क्या कहूं, क्या-क्या मुझे कहता रहा दरिया-ऐ-पल
अब लगे है, कहना-सुनना, दोनों ही जैसे था छल

ये समय का है करिश्मा, या मेरा कोई हुनर
जिससे थी पहचान, वो, जाने गया कैसे बदल

चुप तुम्हारी और देखूं , ये तमन्ना खो गयी
अब तुम्हारे पार कुछ दिखला गया आँखों का जल


अशोक व्यास
      न्यूयार्क, अमेरिका      

3 comments:

Simran said...

Beautiful!!

abhishek said...

बहुत खूब .................

Rakesh Kumar said...

गहन गंभीर है 'तुम्हारे पार'
काश! उस पार देखने के लिए
आँखों में जल आ पाए.

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...