Friday, April 27, 2012

अपने आप में लौटना


लौटते हुए
अपने आप में
देख रहा था
क्या क्या सहेजा गया
इस बार की यात्रा में

दिखाई दिया
स्निग्ध आशीष का कोष
उमंगों का नया गुलदस्ता
धूप के पदचिन्हों से जगमगाता मन

और
शाश्वत को थामे रखने की
नयी कटिबद्धता

इस बार
विराट के श्री चरणों में
अपने आपको
समग्रता से सौंप देने की निष्ठा का
अज्ञात गगन से उतरना
पुलकित कर रहा था
इतना
की 
अपने आप में लौटना
और
अपने भीतर से लौटने का भेद
घुल गया था
क्षितिज में सहज ही


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ अप्रैल २०१२   
      
           

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

शाश्वत को बाँधे रहने की कटिबद्धता..बस और क्या..

कविता रावत said...

दिखाई दिया
स्निग्ध आशीष का कोष
उमंगों का नया गुलदस्ता
धूप के पदचिन्हों से जगमगाता मन

और
शाश्वत को थामे रखने की
नयी कटिबद्धता
..bahut sundar chintan

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...