Wednesday, April 25, 2012

बात कभी पुल बनाती है



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बात खींच खींच कर
कभी कभी
सम्बन्ध के होने की 
अनुभूति का स्वाद 
लेते हैं हम

और कभी कभी
बात ही बात में
खिंचाव का अनुभव कर
अपने आप में सिमट
अपने लिए
सुरक्षित कवच का निर्माण कर लिया
करते हैं हम

बात कभी पुल बनाती है
कभी पुल मिटाती है

कभी 
'मैं' और 'तुम' को 
'हमारा' बनाती है
कभी
'मैं' 'मैं' की तूती बन कर
रह जाती है

 
कविता से कर्म है
या कर्म से कविता 
या शायद
कविता उस दृष्टि तक
पहुँचने की ललक
की हर कर्म कविता बन जाए
जिससे
प्रेम, सौंदर्य, आनंद और संतोष का झरना
सहज ही बह बह आये

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अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
              २५ अप्रैल २०१२          

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रवाह कविता है, भले ही वह कर्म से व्यक्त हो।

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