Sunday, April 22, 2012

तुम्हारे नाम की पुकार


आज
बिना तुम्हें बुलाये
मैंने सोचा था
अपने आप
बगीचे में जाऊँगा
एक नया पुष्प लेकर आऊँगा
और
उस देहरी पर जाकर
चुपचाप रख आऊँगा
 
पर चक्कर काट-2 इस पार
बगीचे की दीवार में
जब दिखा नहीं कहीं भी द्वार


तब हार कर
लगाते ही तुम्हारे नाम की पुकार
सामने से हट गयी  दीवार
 
और सुन्दर दृश्य श्रंखला 
और पावन  सौरभ ने
बदल दिया भाव संसार
 

स्मरण आया
उस देहरी पर
पुष्प रख कर नहीं आते हैं
वहां जाकर हम इन्हें चढाते हैं     


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२२ अप्रैल २०१२  
 
   
 
      
 


 

1 comment:

Rakesh Kumar said...

तब हार कर लगाते ही तुम्हारे नाम की पुकार
सामने से हट गयी दीवार

नाम से नामी का
साक्षात्कार होकर हर बीच की दीवार हट जाती है.

'नहिं कलि करम न भगति बिबेकू,रामनाम अवलंबन एकू,

कालनेमि कलि कपट निधानू, नाम सुमति समरथ हनुमानू'

हनुमानजी की गदा के आगे कोई दीवार कब तक
खड़ी रह पाएगी.

आपका स्मरण कमाल का है,अशोक जी.
पुष्प रखना नहीं चढाना याद रखेंगें अब.

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