Sunday, December 11, 2011

कहीं अकेले में

 
अकेला पर्वत
चुपचाप मंदिर
सूखे पत्ते भाग भाग कर
महादेव की पहरेदारी करते
हवा सनसना कर महीन भक्ति गीत सुनाती
अपनी साँसें सहेज कर
जिस क्षण वह
प्रविष्ट हुआ मंदिर में
नगर के कोलाहल से दूर
सहसा झुक गया शिवलिंग के सामने
किसी और को दिखाने के लिए नहीं
अपनी आदत से भी नहीं
बस
एक भाव के कारण
जो उसने 
 पहले कभी नहीं जाना था
 
तो क्या
ईश्वर जब अपना सम्बन्ध जताते हैं 
                                                         पहले हमें कहीं अकेले में बुलाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० दिसंबर २०११   
             

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सबका अपना व्यक्तिगत संबंध है, ईश्वर से।

Rakesh Kumar said...

तो क्या
ईश्वर जब अपना सम्बन्ध जताते हैं
पहले हमें कहीं अकेले में बुलाते हैं


मेरी समझ में तो ईश्वर जब अपना
सम्बन्ध जताते हैं,सब ओर वही ही
नजर आते हैं.फिर मैं और हम कहाँ,
हम में भी तो वही नजर आते हैं.

कुश्वंश said...

ईस्वार का सम्बन्ध सीधा ह्रदय और मन से होता है शायद

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