Saturday, December 10, 2011

तुम्हारी नित्यनूतन महिमा


 
आज फिर
छत पर बिछे हुए उजाले में
ढूंढ रहा हूँ
तुम्हारा गुप्त सन्देश
इन आँखों से
जिन्हें रोशन करता है
तुम्हारी ही कृपादृष्टि का अलोक
 
आज फिर
हंस की तरह
चुग रहा हूँ 
आनंदामृत का स्वाद दिलाते
अनुभूति के ये मोती
जिनके प्रकटन में
मुखरित होती है
तुम्हारी
नित्यनूतन महिमा
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० दिसंबर २०११          
    

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