Thursday, December 1, 2011

माँ वहां तक है भीतर मेरे

 
सूर्योदय के साथ
नए दिन के आगमन की खबर तो मिल जाती है
पर सूर्योदय के होने का मर्म
हर दिन मेरी माँ मुझे बतलाती है
 
माँ ना जाने कैसे
किरणों के बीच में चलती परियो से मेरा परिचय करवाती है
मेरे भीतर
अदृश्य जगत की संभावनाएं दिखा कर मुझे विस्मित कर जाती है
 
माँ वहां तक ही नहीं
जहां वो पहली बार इस जगत से सम्बंधित होने का भाव मुझमें जगाती है
माँ वहां तक है भीतर मेरे
जहाँ तक साँसों की ये श्रंखला चलती जाती है
या शायद उसके बाद भी
माँ ही साथ निभाती है
और जिसे-जिसे माँ की याद आती है
उसे माँ मिल जाती है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१ दिसंबर २०११ 
 

4 comments:

Rakesh Kumar said...

माँ वहां तक है भीतर मेरे
जहाँ तक साँसों की ये श्रंखला चलती जाती है
या शायद उसके बाद भी
माँ ही साथ निभाती है
और जिसे-जिसे माँ की याद आती है
उसे माँ मिल जाती है

तभी तो पुकारते हैं
'त्वमेव माता च पिता त्वमेव ........'

आप पुकारिए बस.
वही माँ, वही पिता,बंधू ,सखा आदि
हर रूप में मिल जाने को तत्पर है.

मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर पर आपके सुविचार अपेक्षित हैं.

रजनीश तिवारी said...

माँ हमेशा साथ होती है ...सुंदर रचना

प्रवीण पाण्डेय said...

माँ शब्द ही माँ जैसा है, ईश्वर जैसा।

अरूण साथी said...

साधु-साधु
अतिसुन्दर
मर्मस्पर्सी

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...