Sunday, August 28, 2011

भीगी हरियाली





और हवाओं की पूछ-ताछ के बाद
बचे हुए पेड़
 सौम्य छाया लुटाते
अब तक
स्नेहसिक्त गंध पहुंचा रहे हैं
 टूटी हुई शाखाओं तक   

  हवाओं के नए गीतों में
  सांत्वना की मादक गंध है

 भीगी हरियाली के बीच
         सौन्दर्य की जो एक बहती हुई अनुभूति है
इसे थाम कर
ठहर जाना संभव नहीं
पर
 नित्य मुक्त सौन्दर्य के पदचिन्ह 
  ठहर गए हैं
भीतर मेरे


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२८ अगस्त 2011  


5 comments:

Rakesh Kumar said...

नित्य मुक्त सौन्दर्य के पदचिन्ह
ठहर गए हैं
भीतर मेरे

अशोक जी,आप नित्य मुक्त ही तो हैं.
नित्य मुक्त सौंदर्य के पदचिन्ह को अपने
अंदर ठहरा कर आत्म मुग्ध हो रहे हैं आप.

आपकी इस आत्म-मुग्धता को मेरा सादर नमन.

प्रवीण पाण्डेय said...

यह सोंधापन मन्त्रमुग्ध कर देता है।

Dr Varsha Singh said...

मनोभावों को बेहद खूबसूरती से पिरोया है आपने....... हार्दिक बधाई।

मेरे ब्लॉग्स पर भी आपका स्वागत है -
http://ghazalyatra.blogspot.com/
http://varshasingh1.blogspot.com/

अनुपमा त्रिपाठी... said...

बहती हवाएं........बहती अनुभूति........सुंदर अभिव्यक्ति.....!!

कुश्वंश said...

अनुभूतियों का सुन्दर आकाश संजो रखा है अशोक जी आपने , आपका काव्य सब कुछ सच कह देता है बधाई

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...