Thursday, February 17, 2011

एक क्षण में शाश्वत की झलक



"लो हूँ मैं
इस क्षण
पूरी तरह उपस्थित
ना पीछे का कोई चिंतन
ना आगे की कोई चिंता

जो है
जैसा है
स्वीकार कर सबको
प्रस्तुत हूँ
अपना वैभव लुटाने"

झूठी घोषणा करके
देखना लगा इसका प्रभाव
और
रख कर इसे प्रार्थना की थैली में
सोचना लगा
शायद किसी क्षण 
हो ही जाए सच
मेरा इस तारा
पूरी तरह 
अखंडित होना


कविता नहीं
इस क्षण के साथ
मेरे बहुआयामी सम्बन्ध का
एक शब्द चित्र है

कभी यूं होता है कि 
कविता 
एक क्षण में शाश्वत की झलक
दिखलाती है
इस तरह
धीरे धीरे
कविता मुझमें से प्रकट होकर
मुझे गढ़ती जाती है 
   

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१७ फरवरी २०११   

            

2 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

धीरे धीरे
कविता मुझमें से प्रकट होकर
मुझे गढ़ती जाती है

बहुत खूबसूरती से कही अपनी बात ...अच्छी अभिव्यक्ति

प्रवीण पाण्डेय said...

नहीं ज्ञात, कौन किसको गढ़ता है।

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