Wednesday, February 9, 2011

गहरे अनुभव में






कितना अजीब है
अभी जब 
मिला हूँ तुमसे
कर रहा हूँ 
वैसी ही बातें
दिख रहा वैसा ही
कर रहे हैं बात जारी
हम वहीं से
 
पर इस बीच
अपने भीतर
पार कर आया हूँ
एक जंगल
एक तूफानी नदी
देख आया हूँ
पर्वत शिखर
और
उसके मौन की अंगुली थाम कर 
ढूंढ पाया हूँ
एक असीम आकाश 
अपने भीतर


कितना अजीब है
अपने को खोने और पाने के 
गहरे अनुभव में
कोई हो नहीं पाता
साथ हमारे कभी
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
९ फरवरी 2011




3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

विचित्र है कभी स्वयं को जानने लगना, कभी स्वयं को खो देना।

mridula pradhan said...

bahut achcha likhe hai8n.

Ashok Vyas said...

dhaywaad Mridulaji aur Praveenjee

Kavita apne ko jaanne kee yatra
ke chitra bhee hain aur gati bhee

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...