Tuesday, February 8, 2011

जो वह है



बैठ कर
आँख मूंदे
मुस्कुराता हुआ वह 
क्या कट गया है संसार से
या जुड़ गया वैसे
जैसे जुड़ने के लिए
देखना या दिखाई देना जरूरी नहीं


उसके हाथों में
जितनी ताकत दिखती है
उससे कहीं ज्यादा आ जाती है
जरूरत के वक्त
 
उसने सब छोड़ कर
अपना लिया है सबको ऐसे
कि जैसे
अर्थ को अपना लेते हैं शब्द
 
३ 
उसने जितना लिया
उससे कई गुना ज्यादा दिया
कैसा अद्भुत है उसका जीवन
सीमित लेकर असीमित देता रहा है
बिना जताए
जैसे माँ बच्चे को
दूध पिलाये


उसका चिंतन
पावनता की पून्च्जी है
सृजनशील पगडंडी पर 
चलने का आमंत्रण है
हर आयाम में 
सत्य को देखने और अपनाने 
का प्रण है

आचमन से अभिषेक तक
संकल्प से आरती तक
एक जो सूत्र है
वो वही है
उसका चिंतन, सिर्फ चिंतन नहीं
मेरा पूरा का पूरा जीवन है
इतना पूरा कि
तथाकथित मृत्यु भी
अंश मात्र है इस जीवन का
जो वह है
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, ८ फरवरी २०११






1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

दार्शनिक अभिव्यक्ति जीवन की।

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