Thursday, February 3, 2011

कब जाग हो पाती है


बात तुम्हारी है
तुम्हे पहचानती है
पर तुम्हें छू लेने का
तरीका नहीं जानती है
खड़ी है दुर्ग के इस पार
ढूंढ रही है वो द्वार
जहाँ से हो सके उसका सत्कार
 
बात एक
कितनी सारी बातें बनाती है
और अपनी बनावट में
खुद ही छुप जाती है

फिर जब एक दिन
अपने मूल स्वरुप के साथ
तुम तक आने को तैयार हो जाती है
तुम्हें इधर-उधर की बातों से
फुर्सत नहीं मिल पाती है
और ये भी है कि
नींद में डूबी हुई आँखें 
इस बात को देख ही नहीं पाती है
बात खड़ी है दुर्ग के इस पार
ना जाने नवद्वार वाले इस परिसर में
कब जाग हो पाती है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, ३ फरवरी २०११






3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

एक बात से अनेक बात।

Kailash C Sharma said...

बात तुम्हारी है
तुम्हे पहचानती है
पर तुम्हें छू लेने का
तरीका नहीं जानती है..

सही कहा है..गहन अहसास से परिपूर्ण सुन्दर प्रस्तुति..

Sunil Purohit said...

रात के अँधेरे में मार्तंड की प्रचंड ऊष्मा महसूस कर लेते हो,
दिन की चढ़ती धूप में चाँद की शीतलता का एहसास कर लेते हो,
कल तक करती थी बातें जो अपनी आपसे,
छू कर भीड़ से करअलग मूल से जोड़ देगी तुम्हें अब वो |

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