Wednesday, February 2, 2011

एक के बाद दूसरा आन्दोलन




कभी आंच
कभी शीतलता
कितना कुछ प्रकट करता है
निसंग आसमान

तोड़ कर तटस्थता
भाग लेते हुए
अबूझ खेल में
क्या,
कुछ कहते-सुनते हैं
एक दूसरे से
धरती और आसमान

या सुनने-कहने की जरूरत
सौंप कर मानव को
मगन रहते हैं
अपने मौन में
परे इस कोलाहल से
जो जकड लेता है हमें
और उकेर देता है
एक के बाद दूसरा आन्दोलन


हहराती लहर की तरह
किनारे तक जा-जाकर
लौट आने का खेल-खेलते
कभी संवरते
कभी बिखरते 
व्यवस्थित-पुनर्व्यस्थित होने की
जरूरत से बाध्य होकर,
कब तक
 'अनंत की रसमय लीला' का
आनंद लेने से पहले
इस तरह 
अशांत उठा-पटक करते रहेंगे
हम धरती-पुत्र 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, २ फरवरी २०११


1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

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