Thursday, January 27, 2011

किसी की प्रेम गाथा



किसी एक क्षण
जब उतरने लगते हैं
छोटे-बड़े सवाल एक साथ
कहाँ थे
कहाँ हैं
जहाँ हैं वहां क्यूं हैं
दिशा क्या है
समय मुझे चला रहा है
या
मैं समय को चला रहा हूँ
कभी धूप, कभी बर्फ, कभी बरसात
ये सब जो रस्ते में आते हैं
इन सबके साथ मेरा रिश्ता
क्या मैं बनाता हूँ
या कोई और बनाता है
और ये जो कोई और है
इससे मेरा क्या नाता है
तात्कालिक ताल में 
सारे नाते बनाने वाले की तरफ से
ध्यान हट जाता है
मन छोटे- छोटे नातों की पहेलियों
में उलझ जाता है
पर
किसी शांति क्षण में
ना जाने कौन
सब कुछ सुन्दर, समन्वित कर जाता है
खिड़की से दिखते हैं जो
पेड़, पेड़ो पर जमी बर्फ,
थक कर सुस्ताता सा मुस्कुराता आसमान
लगता है ये सब किसी की प्रेम गाथा है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ जनवरी 2011

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

ईश्वर की प्रेमाभिव्यक्ति है यह प्रकृति, देखिये न, कितनी सुन्दर लगती है।

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