Friday, January 21, 2011

फिर उतर रही है बर्फ


 
फिर उतर रही है बर्फ
रूई के फाहों सी
मौन सौन्दर्य की चादर बिछाती हुई
उतर कर 
जब तक ठहरेगी
कुछ सवाल उठायेगी
कुछ सन्देश सुनायेगी
दृश्य बदलने की
अपने ताकत पर इतराए बिना
धीरे धीरे पिघल जायेगी
फिर उतर रही है बर्फ
बाहर
भीतर ऊष्मा है
जो सपनो की
तत्पर है
गति का आव्हान करने के लिए 
और धरती भी 
 देती है आश्वस्ति
करूंगी सहयोग 
तुम जब साहस के साथ 
उठाओगे कदम 
आगे बढ़ने के लिए
मैं प्रशस्त करूंगी पथ तुम्हारा
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
२१ जनवरी 2011


1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

बर्फ और मौन का सम्बन्ध है, पुरातन।

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