Monday, January 17, 2011

शब्द ठिठुर कर जमने ना पायें

 
शब्द ठिठुर कर
जमने ना पायें
आओ मिल कर
स्नेहिल ऊष्मा जगाएं
जिस गीत से
जीवन गति पाये
वो धुन मिल कर
गुनगुनाएं

हम नदिया है अगर
सागर तक जाएँ
और सागर है अगर
किनारा छू आयें

व्रत लिया है
सृजन का हमने
सन्देश अपनेपन का
उत्साह से गायें 
उमड़ते साहस को 
सहयात्री बनाएं 
शब्द ठिठुर कर
जमने ना पायें

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१७ जनवरी २०११

2 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ऊष्मा बनी रहनी चाहिए ....बहुत अच्छी अभिव्यक्ति

प्रवीण पाण्डेय said...

यह प्रवाह जमने न देगा।

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