Thursday, January 13, 2011

नित्य प्रेम व्यवहार सिखाता है कोई


 
 
नित्य प्रेम व्यवहार सिखाता है कोई
मधुर मौन में उड़ कर आता है कोई

 अनदेखे हिस्से हैं भीतर जो सुन्दर 
उनको आलोकित कर जाता है कोई
 
 
उसके बोल पांखुरी जैसे फूलों की 
पर हर भय को दूर भगाता है कोई
 
हर पल नूतन होता है उससे रिश्ता 
पग-पग रसमाधुर्य लुटाता है कोई
 
लेन-देन पर उसका कोई ध्यान नहीं 
पूर्ण है जो, परिपूर्ण बनाता है वो ही

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ जनवरी २०११

 
 



1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

वही हमारा प्रेम सरोवर।

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