Saturday, January 8, 2011

अमृत पथ ही अपना पथ है


अमृत पथ ही अपना पथ है 

बात पुरानी नई शपथ है
अमृत पथ ही अपना पथ है
सभी व्रतों में एक बात है
सत्य का व्रत ही अपना व्रत है
वहां प्रेम हो रहे सहज ही
जहाँ त्याग की नित संगत है
कैसे गाऊँ झूठ की महिमा
अनुग्रह आँगन, कृपा की छत है
विविध रूप हैं मेरी माँ के
सुन्दर ऋतुओं की रंगत है
बीज वृक्ष कैसे बन आये
रेत नहीं, करूणा जाग्रत है
लिखा हथेली पर जननी ने 
कभी ना डरना, तू अमृत है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ जनवरी २०११
शनिवार




2 comments:

अरुणेश मिश्र said...

कविता मंत्र है ।

प्रवीण पाण्डेय said...

भय तो विषवत है।

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...