Friday, January 7, 2011

मंगल मौन






सहज है
हर क्षण की आवभगत करना
तत्परता से 
हर सांस में जाग्रत दीप लेकर
सम्भावना की आरती करना

सहज है
हर संपर्क में
आत्म तृप्ति उंडेल कर
पूर्णता का नित्य नूतन दरसन करना

सहज है
कृतज्ञता से
सृष्टिकर्ता के अपार वैभव को 
विस्मय से
हर पग पर देखना,
मुग्ध होना
और
सर्वव्यापी के 
सतत साहचर्य से
तन्मय होकर
चिर विस्तृत
मंगल मौन में 
लीन हो जाना

पर देखा-देखी में
कई बार
हम अपनी सहजता
के साथ
 असहज हो 
एक ऐसी चक्रीय गति का हिस्सा बन जाते हैं 
जहाँ पाने की होड़ में ऐसी दौड़ लगाते हैं 
कि अपनी सहजता से दूर होते जाते हैं
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
७ जनवरी २०११

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

समय के साथ जीने की उत्कण्ठा ने जीवन को रसहीन बना दिया है।

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...