Saturday, November 27, 2010

निश्छल प्यार

प्रार्थना
रूप रंग बदलती है
समय के साथ
चाहतों की तस्वीर
बदल देते
नए नए हालात

तो वह सब
जो मैंने कभी माँगा था
जो तुम दे भी चुके हो मुझे शायद
अब प्रासंगिक नहीं लगता
और
आज सुबह सोचता हूँ
क्या मांगूं तुमसे
जो हमेशा बना रहे प्रासंगिक

मैं कैसे उपयोगी बनाऊँ अपना जीवन
सोच सोच कर
हर बार
नहीं देख पाता
किसी योजना का आकार
बस इतना चाहता हूँ 
जाग्रत हो मुझमें
हर हाल में बना रहने वाला
निश्छल प्यार
इसी से 
खनक जायेगी 
प्रासंगिकता की
नित्य झंकार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ नवम्बर 2010

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

प्यार निश्छल ही हो।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...