Thursday, November 25, 2010

मेरे समर्पण की धारा

और फिर
नए सिरे से
बात तुम्हारी
पलट पलट कर
देखता हूँ
अर्थ अपने होने का,
जहाँ हूँ
वहां भी
 निखर आती है पूर्णता 
मेरे चारों ओर जो
करती है प्रमाणित
तुम दूर नहीं हो मुझसे
कभी भी
कहीं भी
और होती है आश्वस्ति
मेरे समर्पण की धारा
पहुँच रही है
तुम्हारे चरणों तक


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
25 नवम्बर 2010

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

भक्ति के समधुर शब्द।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...