Wednesday, November 3, 2010

उत्सव सा यह है जो भीतर

 
 
उत्सव सा यह 
है जो भीतर
नई उमंगो का
यह निर्झर
सांस सांस से
मुखरित होती
जैसे कोई
दिव्य धरोहर


उजियारे का 
करने स्वागत
मुझमें फिर 
मुस्काया शाश्वत
जो जो 
प्यार बढ़ाना चाहे
मैं उससे 
होता हूँ सहमत


आज कामना
रूप नया लेकर आई है
लेन-देन से परे
समर्पण रुत छाई है
साफ़ दिखे है
अब संदेह नहीं है कोई 
ज्योति संग भी 
चले ज्योति की परछाई है
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
३ नवम्बर २०१०

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

मन में मन की परछाईं हैं,
जीवन-नगरी अलसाई है।

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...