Monday, November 1, 2010

निर्मल मौन



इस क्षण से जुड़ने
छोड़ देना है जो कुछ
उसकी याद मिटाने का रबर नहीं है मेरे पास,
बस इस क्षण की चमक 
उजागर करने
शुद्ध माध्यम बनने का करता हूँ प्रयास 
 
इस तरह 
 निर्मल मौन लेकर
प्रकट होती है प्रेम की छलछलाती धार
जिसमें सहज हो जाते 
शांति, समन्वय 
करूणा, आत्मीयता और विस्तार 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१ नवम्बर २०१०



2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

निर्मल मौन, कितना कठिन है पर कितना मधुर है।

सुज्ञ said...

अहा, सुंदर सात्विक……

इस तरह
निर्मल मौन लेकर
प्रकट होती है प्रेम की छलछलाती धार
जिसमें सहज हो जाते
शांति, समन्वय
करूणा, आत्मीयता और विस्तार

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...