Thursday, June 17, 2010

'देखने की स्वतंत्रता' का जो उपहार



उस दिन जब हम
पहाड़ की चोटी पर बैठे थे
वो मुस्कुरा रहे थे
मौन में प्रेम था 
आश्वस्ति भी
हवा में पूर्णता बज रही थी

क्षितिज तक देख कर
विस्तार को एक घूँट में पी लेने की आतुरता जागी
पर अस्थिरता के भाव को लेकर
मैं उन्ही प्रश्नों की पगडंडियों पर भटकने लगा
जिनसे निकलने के लिए
इस 'महायोगी' की साथ
इतनी ऊँचाई तक पहुंचा था

वो मुझे देख कर मुस्कुराये
जैसे मन की बात समझ गए हों
बोले कुछ नहीं


उनके साथ का मौन
मेरे संशयों और सवालों को लील जाता है
मैं वह हो जाता हूँ
जो मैं अपने को मानता नहीं

चिंतामुक्त, प्रेम के निर्बाध, निश्छल स्वरुप से छलकता सागर
इस क्षण ना कोई कामना
ना कोई याचना
ना किसी से द्वेष
सबके मंगल की कामना
सबके कल्याण की प्रार्थना


मन में किसी सुप्त तरंग ने अंगड़ाई ली
और उनका क्या 
जो तुम्हारे शत्रु हों
जो तुमरे राष्ट्र और संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं

महापुरुष की ओर देखा
'क्या उनके लिए भी प्रेम और क्षमा भाव रखूँ?'
मन ही मन पूछा
मन में ही उत्तर झाँका
'क्या ऐसा मान सकते हो
कि तुमसे अलग कोई नहीं?'
मैं ने तड़प कर कहा
'कैसे मान सकता हूँ,
मैं तो नहीं बारूद बिछा रहा
मैं तो नहीं चला रहा गोलियां?'

४ 
सहसा वो उठ खड़े हुए
चलने की मुद्रा थी
मैंने उनकी चरण पादुकाएं
उठा कर उनके सम्मुख रखीं
उन्होंने मेरे काँधे पर हाथ रखा
मेरी आँखों में झाँका
मैं सिहर सा गया
लगा, वो तो मेरे पार देख रही हैं
मेरा कुछ शेष नहीं है
मैं धुल रहा हूँ
मेरा 'मैं ' घुल रहा है
सीमाओं का सम्बन्ध मुझे छोड़ रहा है
मैं गर्दन झुका कर ये देखना चाहता था
कि क्या मेरे पांवों के नीचे ज़मीन है
पर एक तरह की
रसमय तन्मयता ने मुझे 'अखंड चैतन्य के साथ एकमेक' कर दिया था


चलते हुए मैंने
तुतलाते से स्वर में उनसे कहा
'मुझे लगता है
आपके पास सब समस्यों का समाधान है
पर आप बताते नहीं'
'ऐसा!' वो मुझे देख कर मुस्कुरा भर दिए
बोले कुछ नहीं

मैं सोच रहा था
किसी तरह उनके भीतर उस 'स्थल' तक पहुंचूं 
जहां सारे संशयों का निवारण करने वाली 
पूंजी है
और उसे चुरा कर अपने साथ रख लूं
 ताकि प्रेम के साथ 'संशय मिश्रित सतर्कता' को 
हमेशा साथ
ना रखना पड़े


उन्होंने अचानक
मेरे काँधे पर से हाथ हटाया
यूँ चलने लगे जैसे 
हम एक-दूसरे को जानते ही ना हों

फिर एक स्थान से
डूबते सूरज की ललाई को निहारने के लिए रुके
ऑंखें मूँद ली
मद्धम स्वर में बोले
मुझसे या शायद अपने आप से

"हम प्रकाश कर सकते हैं
आँखें दे सकते हैं
पर 'देखने की स्वतंत्रता' का जो उपहार
हर मनुष्य को दिया गया है
उसे तो वापिस नहीं ले सकते
प्रतिक्रिया के लिए भी 
इस 'मानवीय धरोहर' से खिलवाड़ करने लगे 
तो मनुष्य में पूर्णता की सम्भावना कैसे बचेगी?"


विदा लेने से पहले उन्होंने कहा
"कल तुम अकेले
पहाड़ की चोटी तक जाना
वहां से जो जो दिखे
बाहर और भीतर
मुझे आकर बताना"


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७:०० बजे
गुरुवार, १७ जून २०१०


1 comment:

वन्दना said...

बहुत ही सूक्ष्म स्तर तक पहुँच गयी हैं आपकी रचनायें आत्मबोध कराती हुयी…………दिव्यता को छू गयी हैं।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...