Wednesday, June 16, 2010

संकल्प रहित होकर

 
तो कहो 
क्या किया अब तक
उस सबमें से
जो किया जाना था
 
पूछ कर अपने आप से
देखता हूँ मन अपना

ना जाने कैसे
आनंद के प्रवाह में
बह जाते हैं
सभी उकेरे हुए संकल्प

ध्वनि एक 
उसके 'होने की'
गूंजती है अनवरत

नाद यह निरंतर
उंडेलता है जो अमृत रस
इसकी अनदेखी कर
क्यूं कहीं और जाना
क्यूं कुछ और पाना
 
सजावट सारी 
इस "अवतरित" में रमने के लिए
जहाँ जहाँ ले जाए
वहां वहां है जाना

आत्मरमण का अवकाश जुटाने
जिस जिस से मिलना हो
उस उस से मिल आना

प्रेम का प्रसाद 
वितरित करने हेतु
उचित पात्र 
कभी ढूंढना, कभी गढ़ना

संकल्प रहित होकर
सारे संकल्प पूरे कर देने
सहज श्रद्धा और उत्साह लेकर बढ़ना

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ जून २०१० 
सुबह ६ बज कर ३० मिनट
 
 

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