Friday, June 4, 2010

नया हो जाता है संसार


लौटने से पहले
पूछा था उसने
एक बार और
वही सवाल
और
फिर एक बार
मैंने दिया था
वही जवाब

फिर भी
बदल गए थे
हम दोनों


बदलाव
सवालों और जवाबों के बीच
किसी चुपचाप पगडंडी से
चला आता है
अनायास
तब जब हम
कुछ नहीं कर रहे होते जानते बूझते

करवट अनंत की
इस तरह
व्यवस्थित करती है
भीतर से हमें कि 
नया नया हो जाता है संसार

अशोक व्यास
सुबह ४ बज कर ६ मिनट पर
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, जून ४, 2010

No comments:

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...