Wednesday, June 2, 2010

गहन शांति का अतुलित वैभव


(जब झरना एकाकी गाये,  आत्मसुधा रस स्वर सुन आये  )

है तेरा आभार निरंतर 
हर स्वर में तू छुपा हुआ पर
बिना समन्वय दिख ना पाए
हर एक दर है तेरा ही दर

दुःख-शोक, भय-क्लेश मिटा दे 
सत्य को ढकता वेश मिटा दे
गहन शांति का अतुलित वैभव 
जहाँ खिले है, वहां बिठा दे

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर २७ मिनट
२ जून २०१०, बुधवार

No comments:

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...