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(जब झरना एकाकी गाये, आत्मसुधा रस स्वर सुन आये | ) |
है तेरा आभार निरंतर
हर स्वर में तू छुपा हुआ पर
बिना समन्वय दिख ना पाए
हर एक दर है तेरा ही दर
दुःख-शोक, भय-क्लेश मिटा दे
सत्य को ढकता वेश मिटा दे
गहन शांति का अतुलित वैभव
जहाँ खिले है, वहां बिठा दे
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर २७ मिनट
२ जून २०१०, बुधवार
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