Thursday, November 26, 2009

एक आकारहीन अस्तित्त्व


शब्द नहीं
गंगाजल में भीगा
रुमाल है माँ का
पोंछ कर अपना माथा
तरो ताज़ा कर रहा अपना चेहरा

हो रहा तैयार
नए दिन का स्वागत करने

शब्द नहीं
मुस्कान है आसमान की
मुझ पर अपनी छाप छोडती
गुदगुदा कर
मुक्त करती मुझे
मेरी क्षुद्र चिंताओं से

शब्द नहीं
साकार रूप है सपने का
आश्वस्ति गहरी
संबल शाश्वत

झरना उत्साह का
बहता है जो भीतर मेरे
शब्द स्पर्श से

कहाँ छुप कर
प्रतीक्षा करता था
मेरे भीतर ये
शब्द के आत्मीय स्पर्श की

शब्द मिलते हैं
रात्रि के उस छोर पर
भोर को खींच खींच कर
मेरे पास लाते

सुबह की अगवानी में
मुझे साथ रखते हैं शब्द

और इस तरह
खुल जाती है
एक पटरी
जिस पर चल पार करता हूँ
दिन सारा

पार दिन के रात ही होती अगर
तो क्यों करना था पार इसे

रात और दिन के बीच
अपने अनदेखे स्थलों तक
यात्रा करता हूँ में

कई संदर्भो के रंग
सजा देते हैं
हर दिन को

जिनमें उलझ कर
फिर अपना चिर मुक्त चेहरा ढूंढता
लौट आता शब्दों के पास

शब्द धरती हैं
शब्द आकाश हैं
शब्द क्षितिज भी हैं

शब्द अपने आकार में
सहेजे रखते हैं
एक आकारहीन अस्तित्त्व

जो देता है अवकाश मुझे
इस भरोसे के साथ
कि मेरी पहुँच में है 'विस्तार अपार'

एक के बाद एक
सीढ़ी पर चढ़ना नहीं

पहाड़ पर
हर कदम
अपने लिए नयी सीढ़ी बनाता है

अनिश्चय के बीच
ना जाने कैसे
शब्द अदृश्य रूप में
हाथ पकड़ कर मेरा
मुझे एक नयी सीढ़ी गढ़ना सिखाते हैं

तो अब तक जो कुछ हुआ
वह नहीं है पर्याप्त

होने को है बहुत कुछ शेष

जगा कर यह आस्था

शब्द करते हैं आव्हान

'देखो दूर तक
देखो ऊंचाई से
देखो उड़ान भरते पक्षी की तरह

देखो क्या कुछ अवांछित उठा लाये हो तुम
साथ अपने

देखो मुक्ति धरी है तुम्हारी हथेली पर
देखो कितनी नदियाँ हैं
तुम्हारे हाथ की रेखाओं में

नदियाँ जो बह रही हैं
हाथ की रेखाओं में

गंतव्य उनका
सागर है जो

उस असीम सागर का
क्या सम्बन्ध है शब्दों से


शब्द शायद सब कुछ जानते हैं
पर मुझे थोड़ा थोड़ा बताते हैं
इस तरह मेरे लिए हर दिन
नयेपन का नया स्वाद बचाते हैं

अशोक व्यास
गुरुवार, नवम्बर २६, ०९
न्यू योर्क, अमेरिका
सुबह बज कर ४५ मिनट

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