Tuesday, November 24, 2009

कैसे सम्भव हो


यहाँ तक पहुँच कर
जब जब मुड कर देखा है
सुंदर लगा है रास्ता

जैसे किसी ने अपनी गोद में उठा कर
करवा
दी हों पार
सारी की सारी चढ़ाइयाँ

फिर हर कदम बनने लगता है प्रार्थना
हर साँस सुनाने लगती है
कृतज्ञता के गीत

तुम सर्वत्र हो अगर
सर्वकालिक हो अगर
सर्वशक्तिमान हो अगर
और मुझसे अटूट सम्बन्ध भी है तुम्हारा

तो फिर
कभी कभी ऐसा क्यों लगता है
कि हो गया हूँ मैं बेसहारा

किसी किसी क्षण एकाकी हो जाता इतना
कि उस क्षण छू नहीं पाती तुम्हारी अनुभूति की धारा

और इतना असहाय भी लगता है अपना आप
की बहुमूल्य जीवन लगने लगता जैसे कोई श्राप

कैसे सम्भव हो
तुम्हारा सतत जाग्रत साहचर्य

कैसे बने हर साँस
नित्य तुम्हारा गुणगान

कैसे दिखाई दे हर मानव मे
तुम्हारी छवि

कैसे हर घटना मे महसूस कर पाऊँ
कृपा तुम्हारी

एक बार यह बात बता देना
गिरिधारी
जय श्री कृष्ण

अशोक व्यास
नवम्बर २४, ०९
नुयोर्क, अमेरिका
सुबह बज कर ११ मिनट

No comments:

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...