Thursday, November 19, 2009

कहा सब कुछ अपने आप से




झुंझला कर कह देना था
सूरज को
ये क्या अभी तो चढ़े हुए थे
अब ढलने लगे
इतनी प्रखर थी धूप जो
कहाँ भेज दिया उसे
और क्यों दे दी अनुमति बादलों को
की ढक लें तुम्हें

उकता कर कह देना था
हवा को
अभी कुछ देर पहले तो
साथ लाई थीं
महक मनमोहन वाली
और अब उठा लाई हो
दम तोड़ती कामनाओं का विलाप

आँख मिला कर कह देना था
समय को
देखो ऐसे नहीं चलेगा
की जब चाहो बहलाओ
जब चाहो नचाओ
जब चाहो बिठा कर
शिखर पर गुदगुदाओ
और फिर पलटो इस तरह
की अपरिचित बन जाओ

पर ना समय को, ना हवा को, ना सूरज को
किसी से कुछ नहीं कहा

कहा सब कुछ अपने आप से

और अपनी कहा-सुनी लेकर
प्रविष्ट जब परम मौन में हुआ

सब कुछ मधुर, समन्वित और सुंदर हुआ

ना झुंझलाहट, ना उकताहट, ना शिकायत
बस एक निश्छल प्रेम नदी की कलकल का स्वर रहा

कान्ति करुणा की घोल कर मेरे अस्तित्त्व में
मुस्कुराता रहा विराट


अशोक व्यास
नवम्बर १८, ०९
न्यू योर्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ४० मिनट

1 comment:

Pandit Kishore Ji said...

bahut badhiya likha hain aapne

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