Sunday, November 15, 2009

प्यास लेकर विस्तार की


ऐसा होने लगेगा
ये नहीं जानता था
अचानक शाखाओं पर टंगी
नन्ही नन्ही बूंदे
इतनी सुंदर लगेंगी
की उनके लुप्त हो जाने पर भी
होने लगेगा अफ़सोस सा

एकाकी रास्ते पर
जान बूझ कर
चलते चलते
क्यों होता है ऐसा
कि किसी एक क्षण
जकड लेता है
अकेलापन
करने लगता है
वो सवाल
जो अकेले में दिए ही नहीं जा सकते

कविता ने मेरे हाथो से
खींच कर
फेंक दिए
सारे नारे
हटा दिए सब इश्तिहार

अब सत्य के नाम का आवरण भी नहीं
पूरी तरह अनावृत होकर
जब दिखाई दूँगा
में इन अनुसन्धान करने वाली
ताजी किरणों का
क्या इन्हे पता चल जाएगा
मैं आखिर हूँ कौन
और इनकी खोज के बारे मैं
कैसे जानूंगा मैं

हाँफते हाँफते
फिर एक बार
पहुँच कर पहाड़ कि चोटी पर
मैं
आँखों मे भर रहा हूँ
विस्तार

शहर कि गलियों मे
घूमता फिरूंगा
पहचान इस विस्तार कि संजोये
और फिर
जब प्रतिस्पर्धा के
धुँए मे और
प्रतिक्रिया के शोरोगुल मे
मिटने लगेगी
विस्तार कि यह पहचान
आँखों से

फिर से घटने लगेगा
आतंरिक प्रसन्नता का स्तर

और तब
जब बस्ती मे कोई भी
नहीं समझ पायेगा
दुःख मेरा

किसी न किसी तरह
करना ही होगा
मुझे यह पर्वतारोहण


प्यास लेकर विस्तार की
यदि बैठा ही रह गया
तो धीरे धीरे
खो बैठूंगा खुदको भी

अशोक व्यास
नवम्बर १६, ०९
सुबह ७ बज कर २८ मिनट
न्यूयार्क, अमेरिका

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