Friday, November 13, 2009

शायद मौन की महिमा से ही मैं हूँ



देर सही
दूर सही
बहते बहते लहरों पर
मिल ही जाएगा किनारा एक दिन

ठीक है शायद यह सोच
एक लकड़ी के लट्ठे के लिए

पर मुझे
यह भी सोचना है
कितनी देर तक
शेष रह पायेगा
यह तन-मन संघात

और यह भी
करना है याद
लहर को नहीं
मुझे तय करनी है
मेरी दिशा

किनारा जो इतना विस्तृत है
इस पर किस खास बिन्दु पर
खुलेगी
मेरी समग्रता मुझ पर
पता इसका भी लगाना है
शेष होने से पहले

अब ना जाने
कैसे उभरता है
चिंतन का यह अनुभूतिपरक बिन्दु
जिसमें गहरायी और ऊँचाई
दोनों आकर मिल जाते मुझमें

इस तरह
की बहना भी ठहराव बन जाता है
ठहरे ठहरे भी
अहसास रहता है गति का
और
यूँ भी लगता है कि
समग्रता खुल रही है मुझ पर
इसी क्षण

इस पूर्णता में पैंठ कर
व्यग्रता से परे
अगाध शान्ति में निमग्न

तन्मय अपने आप में


मौन में ही पराकाष्ठा है शब्द की
महामौन का किनारा ही पा लेना चाहती है
चिंतन-धारा

कविता मौन उपवन से
चुन चुन कर सुरभित पुष्प
बिखेरती है जब

मनाया जाता है उत्सव
मौन की महिमा का
या शायद मेरे होने का

शायद मौन की महिमा से ही मैं हूँ
पर शायद ये भी होता होगा कभी
की मुझसे ही होती हो
महिमा मौन की

शायद भेद कोई नहीं
मौन मैं और मुझमें

काल यह भेद बनाता है
और कविता यह भेद मिटाती है

इस तरह भेद और अभेद के बीच
मेरी जीवन गाथा उभरती जाती है

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ॐ, जय श्री कृष्ण

अशोक व्यास
नवम्बर १३, ०९
सुबह ५ बज कर ५८ मिनट

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