Thursday, November 12, 2009

तृप्ति के अनाम घूँट



तो कैसे उतरोगे सतह तक

लहरों को पार कर

चीर कर प्रतिबिम्ब गगन का

कैसे होगा सम्भव
थाह लेना सागर की

नापना गहरायी
उसकी और अपनी
साथ साथ

सम्भावना की झिलमिलाहट
क्या छलावा है

क्या हो ही नहीं सकते वह
हम कभी
जो हम
समझते हैं की हम हैं

क्यों होता है भेद
होने और होने में

एक यह जो अनजाने में
हुआ गया

एक वह जो जान कर भी
ना हुआ गया

अन्तर इन दोनों का
देख देख
पत्ते झड़ते हैं

नंगी शाखाओं पर
क्या लिखा होता है
पत्तों के बिछोह का दर्द

या
वो रूखेपन में
मना रही होती हैं
उत्सव अपनी स्वतंत्रता का?

पत्ते जो झड़ते हैं
फिर आते हैं
फिर हरा भरा होता है पेड़

क्या इसी तरह
कामना के पत्ते
फिर फिर आकर हरा- भरा करते हैं हमें

शायद यहाँ भेद है
मनुष्य और पेड़ में

कामनाओं के झड़ जाने के बाद भी

शाखाएं नंगी नहीं होती जीवन की

वसंत उगता है
पूर्णता का
छा लेता है पूरे अस्तित्व को

तुम्ही कहो
कुछ न चाहने पर भी
यह जो प्यार की बयार बहती है
कहाँ से आती है

किसी का कुछ न होने पर भी
यह जो एक सहज अपनापन है
यह क्या है

और कभी कभी
आनंद का अद्भुत राग जो
बज उठता है
रोम रोम में

कहाँ है इसका उद्गम
कौन है जो
हर बिछोह के बाद भी
तृप्ति के अनाम घूँट पिला कर
तारो-ताज़ा रख सकता है
एक हिस्सा हमारा

और यह हिस्सा
जो विस्मित करता है
जो हमें लेकर
सृजन वन में नए पग धरता है

कभी ऐसा माधुर्य उंडेलता है
की हर पथ वृन्दावन करता है

यह विस्मित करता हिस्सा
संजो कर लाता है
सागर की सतह के स्पर्श की स्मृति

और सहसा प्रतिबिम्बों का सत्कार करते करते भी
सम्पूर्ण सागर का वैभव खुल जाता है हम पर
एकाएक

फिर सवाल ये
अपने इस सौभाग्य को कहाँ धरें कि
सुरक्षित रहे
और सुलभ हो हमारे लिए हमेशा


अशोक व्यास
न्यूयार्क, नवम्बर १२, ०९
सुबह ६:३५ पर


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