Monday, November 9, 2009

कविता तो नित्य उत्सव है





अच्छाई और बुराई साथ साथ चलती हैं
कोई भी कार्य
दिन-प्रतिदिन
करते करते
हम कुशल होते हैं उसमें
पर साथ ही
यह डर भी रहता है
कहीं यंत्रवत न हो जाए व्यवहार हमारा

कविता हर दिन
नयी हो
नए दिन के साथ
इसके लिए
कर करके प्रयास
नया होना होता है मुझे
हर दिन
पुराने विचारों, स्थापित धारणाओं को
अलग खिसका कर
अनावृत रूप में
हो लेता हूँ
नयी किरणों के सामने

कभी कभी किरण
मुझसे पुरानी धरोहर मांगती है
देखना चाहती है
मुझे अब तक
सत्य की दिशा के संकेत याद हैं या नहीं
कभी कभी किरण
आश्वस्त हो लेना चाहती है
की शेष नहीं है
मुझ पर
किसी अफ़सोस, किसी अवसाद की धूल
और अगर है तो
शायद अलग तरह से
जारी रहेगा आत्मानुसंधान

किरण चाहती है
मैं बिना किसी लाग-लपेट के
जैसा हूँ
वैसा ही आ पाऊँ सामने उसके
किरण
वहां से मुखरित करती है
कविता
जहाँ मैं पारदर्शी हो जाता हूँ

किरण में सूरज विद्यमान है
किरण के साथ
उतर कर मुझमें
सृजनात्मक आभा को
प्रकट करते है वो ही

मैं सूरज का पथ होते होते
किसी एक अनाम क्षण मैं
जब सूरज हो जाता हूँ स्वयं ही
शब्द उस आलोक की अगवानी में
उत्सव मनाते हैं

कविता क्या
उत्सव की तस्वीर मात्र है?
नहीं नहीं!
कविता तो नित्य उत्सव है
उत्सव सृजनशील गति का
उत्सव सत्य के साथ एक मेक होने की लालसा का

इस उत्सव में
किसी क्षण यूँ भी होता है
की
पा लेता हूँ
स्वयं को
फिर एक बार
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कविता की मुस्कान लेकर
प्रेममय आभार जागता है
सबके प्रति
न कोई आक्रोश, न असंतोष
बस
एक सुंदर आत्म-तोष

फिर भी ना जाने
जीवन को कवितामय बना देने से
क्यों इतना कतराता हूँ

जैसे माँ से अलग हट कर
चलना चाहता है
बढ़ता हुआ बच्चा
ऐसे ही
मैं भी अपनी पहचान बनाने
दिन की पगडंडियों पर खेलते खेलते
कविता की दृष्टि को
कहीं छुपाता हूँ
और हर दिन के मेले में
खो जाता हूँ



अशोक व्यास
नवम्बर ८, ०९
सुबह ७ बज कर २६ मिनट
न्यूयार्क

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