Sunday, November 8, 2009

संभावना का नया उजियारा



तो फिर
आ गया नया दिन
हथेली में धर दिया
संभावना का नया उजाला

मुग्ध इसके सौंदर्य पर
इठलाता हुआ
अपने भाग्य पर
बैठा लिखने
आभार पत्र
दिनकर के नाम


आदित्य जी महाराज
नमस्कार
मैं धरती पर रहता हूं
आप आसमान में

आपके होने से मेरा जीवन है
जीवन होने से सब कुछ है

कभी कभी बहुत संकट भी आते हैं
चिताएं घेरती हैं
यह दुःख भी सालता है
की मेरे पास इतना कम
किसी ओर के पास इतना अधिक

पर संकटों, चिंताओं, दुखों के परे
सुख, संतोष, संपन्नता से परे

आधार सारे खेल का
(यदि अपने अनुभवों को खेल कह लूँ)
जीवन ही तो है

जीवन तुमसे है
तुम संभावनों के जनक हो
हर दिन आते हो
हमारी हथेली में
अदभुत उपहार रख जाते हो

कई बार तो अपने आप में खोया
मैं देख ही नहीं पाता की तुमने
सौंप दिया है नया उपहार मुझे

बस लेता हूँ
चल निकलता हूँ
नए अनुभवों, नए सिरे से पुरानी चिंताओं का स्वाद लेने
नए सिरे से पुरानी कसक को सालता
या अपने लिए दिखाई देती दौड़ में फिर एक बार
आंख पर पट्टी बाँध कर भागता

बहुत कम ऐसा होता है
की तुम्हारी तरफ़ देख कर
कृतज्ञता पूर्ण नयनो से देख
कर
धन्यवाद् दूँ तुम्हें

तुमने जो संभावना का नया उजियारा
सौंपा है आज मुझे
इसकी सुन्दरता में
मुझे अपनी सुन्दरता, अपनी आत्मीयता
और अपने होने का गौरव दिखाई दे रहा है

सोचता हूँ
क्या दूँ तुम्हें मैं
जानता हूँ, लेन-देन तुम्हारा तरीका नहीं है
या शायद ले लेते हो तुम
देते देते
अपनी किरणों के द्वारा
और हमें पता ही नहीं चलता

पर इस व्यावहारिक ऊष्मा से परे
तुम्हारी आत्मा के साथ
व्यवहार करने की पात्रता भी
कैसे जाग्रत हो मुझमें?

किरण कहती है
'दग्ध कर दो
कलुष मन का,
मिटा दो संशय
बाँटो उजियारा प्रेम का
बिना किसी अपेक्षा के
तब जानोगे
तुम्हें सूर्य की आत्मा से व्यवहार करने की
आवश्यकता ही नहीं
तुम तो एक- मेक हो
हिरण्यगर्भ के साथ"

अशोक व्यास
नवम्बर ८, ०९
न्यू यार्क
सुबह ७:४३ par

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