Saturday, November 7, 2009

तुम्हारे होने की यात्रा







सत्य क्या वह है
जो मेरे मानस की उपरी सतह पर
इस क्षण
मेरे लिए दुःख, पीड़ा, आक्रोश और असंतोष का
कारण बनता है

सत्य क्या वह है
जिसे मैं तात्कालिक संदर्भो
में घिर कर देख ही नहीं पाता

सत्य क्या वह है
जो मेरे होने से अर्थ ही नहीं रखता
जिसे मेरी इच्छाओं, मेरे सपनों, मेरी आशा - निराशा से
सरोकार ही नहीं कोई

सत्य तुम कौन हो
क्यों मुझे लगता रहा है
की तुम्हारे बिना जीवन का आधार ही नहीं कोई

पर तुम्हें पहचानना इतना मुश्किल क्यों
तुम तो हर गली पर, हर मोड़ पर परे हो गए लगते हो
मुझसे
जब जब मैं रोया, तड़पा, कसमसाया
किसी बात की कसक लेकर

कहाँ थे तुम
जब जब मुझे लगा
जो कुछ हो रहा है
वह वह तो नहीं जो मैं चाहता था

सुनो तो जरा
बताओ मुझे
ओ सत्य! क्या सिर्फ़ इसीलिए हो तुम
की मुझ पर हँसा करो
और मैं अपनी छटपटाहट लेकर
भागता रहूँ
क्षितिज की ओर


सत्य!
आज कुछ बोलो ना मुझसे
कहो कुछ तो
बताओ अपने बारे में

मुझे भी
बिन देखे
तुम्हारी ओर क्यों है
यह आकर्षण सा
क्यों लगता है
तुम्हारे बिना
अर्थहीन है अस्तित्व मेरा

सत्य, ओ सत्य
आज कर ही दो कृपा
व्यक्त कर दो
अपना आप थोड़ा ही सही



सत्य अब कुछ कहने को है
ऐसा अहसास हुआ
ओर फिर
यह संकेत की
सत्य को सुनने के लिए मुझे चुप होना होगा

चुप होना तो मैंने सीखा ही नहीं
कभी अतीत बोलता हूँ
कभी भविष्य बोलता हूँ
कभी वर्तमान को टटोलता हूँ
मैं तो निरंतर बोलता हूँ

चुप होने के लिए तो
मुझे तीनो कालों से परे जाना होगा
कैसे सम्भव होगा वह मेरी लिए?

सत्य भाई
सुनो
तुम तो बड़े हो
कालातीत हो, सुना है
क्यूँ न तुम ही आकर मिल लेते
मुझसे मेरी सीमाओं में

मिलता तो हूँ
पर तुम पहचानते नहीं मुझको

कैसे बोलने लगा सत्य मुझसे मेरे मौन में
अचरज को अनदेखा कर
बात जारी रखने सत्य से
ईमानदारी के साथ पूछ बैठा में

कैसे हो पहचान तुम्हारी
कहो ना
बताओ तरीका कोई

लगा सत्य मुस्कुराया
कहा
जब तुम पहचान की प्यास से परे
निकल आओगे
तब मुझे पाओगे

कैसे सम्भव है यह
की पहचान की प्यास मिट जाए
मैं तो रात-दिन भागता रहता हूँ
पहचान के लिए

सत्य के संकेत ने कहा
'जब तुम अपने आप में
पूर्णता की अनुभूति कर पाओगे
खोने पाने के क्रम से परे
कर्म के द्वारा नित्य अपने होने का उत्सव मानोगे
जब तुम हानि-लाभ से परे
अपने होने के आनंद में
नित्य रमण कर पाओगे
तब सत्य को निरंतर अपने साथ पाओगे
ओर स्मरण रहे
सत्य शाश्वत है
पर उसे भी अच्छा लगता है
तुम्हारे होने की यात्रा मैं शामिल होना

तब शायद तुम भी समझ पाओगे
की तुम्हारे होने की यात्रा
आरम्भ से अंत तक
सत्य ही सत्य है

अशोक व्यास
नवम्बर ७, ०९
सुबह ७ बज कर १६ मिनट
न्यू यार्क

1 comment:

अजय कुमार झा said...

बहुत सुंदर कविता और सुंदर भाव अशोक जी ....शुभकामनाएं

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