Wednesday, November 4, 2009

जो कोलाहल में मौन से जुड़े








एकाकी
बैठ कर
रेत के टीले पर
देखने आया था जब
सूर्योदय
की लालिमा

सब कुछ कितना शांत था
अपने आप में मगन सा
और उस क्षण जब धीरे धीरे
एक एक कतरा प्रखर सूर्य का
उभरता देखा
जैसे धरती के आँचल से

क्षितिज को मिल गयी
दुनिया भर की सुन्दरता

मुग्ध मैं
देखता ही रहा था
अन्धकार से उजियारे तक की
साझी यात्रा हमारी

पर धीरे धीरे नहीं
अब तेज़ी से
ऊपर की ओर
अपने अधिकार का दावा करते
सूरज देवता ज्यों ज्यों
चढ़ते गए ऊपर

दृश्य बदल गया
अब कविता नहीं
गति ही गति देने लगी दिखाई

हर दिन हमें कविता से परे ले जाने
की कोशिश करता है
और हम
किसी तरह मारा-मरी, आपा-धापी में
बचाए रखना चाहते हैं
कविता

कविता वो दृष्टि
जो कोलाहल में मौन से जुड़े
अस्त-व्यस्त जीवन मैं
ढूढ़ ले समन्वय और
चखती-चखाती रहे
रस सतत सौंदर्य का

अशोक व्यास
नवम्बर ४, ०९
न्यू यार्क, सुबह ७:21

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