Sunday, November 1, 2009

परीक्षण


परीक्षण

जांच कैसे हो
की कहाँ हो गई है गलती
पलट कर
पलट पलट कर
अपने ही कदमों को देखते हुए
किसी एक मोड़ पर
जब हो जाए स्पष्ट की
दिशा चयन में यहाँ हुई थी चूक
तो अफ़सोस नहीं उपलब्धि का अहसास होता है
अच्छा हुआ हम
ये समझ पाये
की यहाँ से दिशा बदली जानी थी
लो अब बदल लेते हैं

नयी दिशा के साथ
गंतव्य तक पहुँचने का नया उत्साह लेकर
जब चल पड़ते हैं हम

उतरती है भीतर ही भीतर
रास्ते के साथ साथ
स्वयं को पा लेने की अनुभूति

ऐसा क्यों है
पाना स्वयं को हो
तब भी
रास्ता सही सही चाहिए

यानि रास्ते के साथ हमारा
कोई रहस्यमयी सम्बन्ध है
जिसे हम नहीं जानते
और शायद
रास्ता भी नहीं जानता

पर वह जानता होगा
जिसने रास्ते के साथ
हमारा सम्बन्ध बनाया है
और सही दिशा पहचान कर
शायद हम उसी की और बढ़ते हैं
अपनी अपनी गति से

पर कभी कभी रुक कर
पलट कर देखना भी पड़ता है
अपने ही कदमों को

अशोक व्यास
नवम्बर , ०९
न्यू यार्क
प्रातः :०२ पर

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