Sunday, November 1, 2009

जहाँ से सब कुछ बदल सकते हैं



लो देख लो
सारी धरती
सारा आसमान
और ये सब
नदी, पर्वत, पेड़, मैदान

देख रहे हो
हम वहां हैं
जहाँ से सब कुछ बदल सकते हैं

फिर से व्यवस्थित कर सकते हैं
सब कुछ
विश्वास नहीं होता ना
होने लगेगा
जब व्यवस्था उमडेगी
भीतर से तुम्हारे

जब मूँद कर आंखें
देख पाओगे तुम
ज्यों ज्यों आतंरिक व्यवस्था बदलेगी
दुनिया बाहर कि
बदलती जायेगी अपने आप

तो चलो
बाहर कुछ मत देखो थोडी देर
देखते रहो
भीतर का सागर
भीतर कि लहरें
भीतर कि उथल पुथल
भीतर के संशय
और
स्मृति उसकी
जिससे
सुंदर, आभा वाला
प्रखर सूर्य उदित होकर भीतर
फैला देता है
वह उजाला
जो पुनर्व्यवस्थित करता है
भीतर का संसार ऐसे
कि उजाला भीतर का
बाहर तक आता है
तुम्हारी आँखों, तुम्हारे शब्दों, तुम्हारी साँसों से
लो देख लो
सारी धरती
सारा आसमान
और ये सब
नदी, पर्वत, पेड़, मैदान

देख रहे हो
हम वहां हैं
जहाँ से सब कुछ बदल सकते हैं


अशोक व्यास
नवम्बर १, ०९, न्यू यार्क
सुबह ६:०० बजे


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