Thursday, May 25, 2017

मधुर मधुर हो अपना जीवन





उतरती है गंगा
भगीरथ के बुलावे पर
बहती छल छल
करूणा सुन कर तीव्र पुकार
उद्धार की


पीढ़ी दर पीढ़ी
अनुस्यूत
एक भाव
एक सात्विक सातत्य
सहेजता
सम्बन्ध समग्रता से
 खिल  जाता सौंदर्य शाश्वत का

नदी बह रही
अब
छोड़ मर्यादा
तट की

निश्चिंत है
छोड़ कर स्वरुप अपना
आ मिली
सागर में
कभी कभी खो देना ही
होता है
पा लेना सचमुच


बाहें फैला
पकड़ रहा
बादलों को

खिलखिला कर स्वीकारता
पराजय अपनी

हो गया
अंकित
भीगापन
अलौकिक हृदय पर


जुड़ता है
बिना जोड़े
मिले उसे
जो स्वयं को छोड़े
इसी की महिमा
गाये गगन
सुन कर मगन
झूमें पावन
सौंप इसे
तन - मन
पा लिया
 अनंत आंगन

२५ मई २०१७
अशोक व्यास
अरुणाचल आश्रम, न्यूयार्क

4 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

वाह।

sweta sinha said...

वाह्ह...सुंदर👌

Lokesh Nashine said...

बहुत खूबसूरत

Sudha Devrani said...

बहुत सुन्दर...

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...