Friday, November 4, 2016

अपने सपनो का सामान

























जाग  कर आधी रात 
अपने से बतियाना 
कविता के साथ बैठ 
यादों को सुलगाना 

कभी बचपन में उतर जाना 
कभी जवानी में ठहर जाना  

उम्र के इस मोड़ पर जब 
समीप होने लगे ढलान 
इंसान टटोलता है 
अपने सपनो का सामान 

सीढियो पर रुक हुआ गान 
बोझ सा शिकायती सामान 

२ 

आखिर सब कुछ है अपने आप पर 
अपने आरम्भ के आलाप पर 
विस्तार का नहीं कोई छोर 
अपने को बांधे अपनी ही डोर 

जीवन बीतते बीतते 
कुछ नया रचने, कुछ नया गढ़ने 
कुछ नया लिखने, कुछ नया पढ़ने 

 कोई भीतर बार बार कसमसाता है 
नूतन निर्माण के लिए उकसाता है 

एक ढर्रे में चलते जाना नहीं सुहाता है 
बार बार यह प्रश्न उभार आता है 
अपने समय को बनाता हूँ मैं 
या समय ही मुझ बनाता है ?

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, शनिवार, नवम्बर ५ २०१६ 

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...