Friday, September 9, 2016

हंस हंस कर निहाल हुआ


अंक - १

अपनापन लिखता हूँ 
सांसो में 
पढता हूँ प्रेम सब की 
आँखों में 
जीता हूँ कुछ ऐसे 
हंस हंस कर 
पाता सब बातों ही 
बातों में 

हंस हंस कर निहाल हुआ 
उससे मिलना कमाल हुआ 
एक पल उसने देखा ऐसे
बैठे बैठे मैं मालामाल हुआ 

अशोक व्यास 
सितंबर ९, २०१६

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