Sunday, January 25, 2015

जो नित्य है

१ 
अभय कहाँ हो तुम अब 
इस क्षण 
जब 
एक अनाम अनिश्चितता 
मुझे घेर कर 
सुना रही 
राग असमंजस 
२ 
इस क्षण 
जब मांग रहा 
साफ़ आसमान 

प्रकट हुए 
सूर्यदेव अंतस में 
उजियारी किरण अनंत की 
छिटकी 

३ 
छंटा संशय 
विश्वस्त मन में 
दीख पड़ा 
तुम्हारी उपस्थिति का संकेत 

तुम यहीं थे शायद 
देख नहीं पा रहा था 
पर तुमको मैं 
कुछ देर 
जो 
गम अपने कुहांसे में 

क्यों होता है ऐसा 
नहीं देखता वह 
जो है 
वह 
जो नित्य है 

अशोक व्यास 

Saturday, January 24, 2015

कविता क्या है


कविता क्या है 
लिख लिख कर पता लगाता हूँ 
फिर लिखता हूँ 
क्योंकि जाना हुआ भूल जाता हूँ 

कविता 
पता लगाने का पथ है 
की मन कहाँ है 
किस बात में रत है 

कविता 
मन के संसार का ताना-बाना है 
कुछ जानना है 
कुछ बताना है 

और कहने सुनने के क्रम को 
ऐसे अपनाना है  
की अपने साथ 
एक मेक हो जाना है 

तो क्या कविता 
एकत्व की अनुभूति जगाना है 
जो हर काल में रहता है 
उसके संग घुल मिल जाना है 

स्वयं से अलग होकर 
स्वयं को देखते जाना है 
सत्य है या श्रृंगार सत्य का 
कविता जीवन को थपथपाना है 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२४ जनवरी २०१५ 

Friday, January 23, 2015

परिधि के पार



 अन्तर ये हो गया इस बार 
पग पग सुलभ, गंतव्य सार 
जिसके लिए, जाना उस पार 
 वह मिल गया है इस पार 

यात्रा अब, अपना सहज विस्तार 
देखना है स्वयं को परिधि के पार 
खोने-पाने से परे का संसार 
पग पग  मुखरित,प्यार ही प्यार 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२३ जनवरी २०१५ 

Wednesday, January 14, 2015

स्मृति पतंग

 
टटोल टटोल कर 
यादों की पच्छीत पर 
बरामद करना 
वो दिन 
पतंगों के 
आकाश के 
उत्साह के 
पेच लड़ाने की प्रतिस्पर्धा वाले 
 
गज़क, रेवड़ी 
छत 
आसमान 
पतंगों के साथ उड़ती सी जान 
 
पेच लड़ गया है 
धागे से हाथों तक पहुँचती पहचान 
 
कभी ढील 
कभी खींच 
 
कभी कोई दूर उड़ती पतंग 
की खींच में 
अपनी पतंग गँवा कर खिसियाना 
 
कभी कोई पेच काट कर 
मन ही मन 
अवर्णनीय संतोष पाना 
 
और अपनी छत से उड़ती पतंग के साथ 
अपनेपन वाली वो अजीब सी बात 
 
अब 
'वो काटा है' का सामूहिक स्वर 
जगा कर यादों के ऑडिटोरियम में 
ठहाकों की जगह 
एक कसक सी भर जाती है 
 
एक कसमसाहट 
जैसे नौका जा चुकी है किनारे से 
लौटने वाली नहीं है 
 
अब धीरे धीरे 
सिमटता जा रहा है 
वो हिस्सा 

जिसे छूकर मुमकिन था 
यादों के उजाले में नहाना 

अब जैसे 
खो रहे हैं वो रास्ते 
जिन पर चल कर 
बचपन के पेड़ों पर 
कूदना- फाँदना संभव हो 
जाता था 

आज 
इतने दूर 
गुलाबी नगर के उन दिनों से 
जब छतों की रंगीनियों में 
बेहिसाब मजा आता था 

वो अनुभव, वो अनुभूतियाँ 
परे हैं अब पहुँच से 
फिर भी 
आँख की कोर से 
बहते ये आंसूं 
शायद एक छोटी सी कोशिश  हैं 
उन स्मृतियों को बचाने की 
जिनसे बना है 
मेरे बनने का रास्ता 
पर 
कितना कुछ छूट जाता है 
बनते बनते 
सहज ही 

और इस क्षण 
जब कट कर 
हिचकोले खा रही है 
स्मृति पतंग 

भाग भाग कर 
शब्दों के साथ 
निकल पड़ा हूँ 
इसे लूटने 
नंगे पाँव 
यादों के पेच लड़ाता 
अपने मन के आकाश में 
मैं ही उड़ाता हूँ जादू की पतंग 
और 
अपने बेमाने से लगते बीती पलों में 
सारे जीवन का मतलब देख आता हूँ 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
जनवरी १४, २०१५

Wednesday, January 7, 2015

आज तो खूनी खबर से लाल है अखबार



 अब भी यकीन है मुझे 
 कहीं से बहेगी 
ऐसी गंगा 
जो सब तक 
शांति का सन्देश पहुंचाएगी 

मुझे अब भी लगता है 
महसूस पाएंगे हम 
एक दूसरे के दर्द को 

बारूदी गंध भरी है हवा में 
पर मुझे लगता है 
चमन में 
फिर खिलेंगे पुष्प 
फिर से आएगी 
वो महक 
जिसमें मैं अपने 
मनुष्य होने की गरिमा सूंघ पाऊंगा 
तुम्हारे साथ 

२ 

मुझसे छूटता नहीं 
इस आशा का दामन 
जो अब भी देख रही है 
समन्वय का सपना 
जिसके साथ 
अपनेपन के किस्से 
दिन-रात एक करने के साथ साथ 
हमें भी एक कर देते हैं 

३ 

तमाम विसंगतियों के बावजूद 
मैं अब तक बचाये हूँ 
सबसे एकमेक होने का सपना 
जिसके साथ 
सहेजी हुई है 
मेरे पुरखों की 
बरसों की तपस्या 

मैं उस परंपरा की पैदावार हूँ 
जो बिच्छू को बचाने के लिए 
डंक सह लेने से नहीं कतराते थे 

मैं उन सबकी शाश्वत आँखों से 
देख रहा हूँ 
काल को आच्छादित करते कुहासे से पर 
एक सौम्य, निर्मल, स्निग्ध सुबह 
धरी है 
हमारे लिए 
इसी धरा पर 

जहाँ 
इन दिनों सांस लेते हुए भी 
अपने सुरक्षित होने पर यकीन करना भी मुश्किल है 

फिर भी 
ना जाने क्यूँ 
मुझे यकीन है 
भगीरथ के बुलाने पर 
आखिर कहीं से बहेगी 
ऐसी गंगा 
जो सब तक 
शांति और समन्वय का रसमय स्पर्श पहुंचाएगी 


आज तो खूनी खबर से लाल है अखबार 
शायद कल हिंसा को धो देने वाली 
इस नदी के उत्तर आने की 
खबर आएगी 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जनवरी २०१५ 

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...