Friday, December 25, 2015

समय का पहिया

 

यह क्या है
जाग्रत रहे जिससे
तुम्हारा एक अंश
चेतना में
तुम्हारे चिरनिद्रा में लीन
हो जाने पर भी ?
ना  जाने कैसे
इस अबूझ से
पा लेता है
 आश्वस्ति सी  जीवन 
 २ 
आंसूओं की धारा से
पलट नहीं पाता 
समय का पहिया

पर किसी तरह पलट आती है 
रस्मयता तुम्हारी उपस्थिति की 

अब छोड़ दिए हैं
धूप को थैले में भर कर
घर लाने के प्रयास 
पर बाँध लिया है
किसी अनाम स्थल पर
तुम्हारी याद को मजबूती से 
क्योंकि तुम्हारे होने से ही तो 
अपना होता रहा है
 संसार सारा 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२५  दिसंबर २०१५

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