Wednesday, July 8, 2015

एकमेक सकल व्योम के साथ















उसके पास न उदासी थी न ख़ुशी
एक उदासीनता थी
एक चुप्पी सी
जैसे सब कुछ हो चूका हो
वह सब जो छुपा है
भविष्य की कोख में
देख लिया गया हो
एक ऐसी आँख से
जो काल के पार देख सकती थी सब कुछ



उसके पास न उत्सुकता थी, न निराशा
एक अपनापन था सारे घेरे से परे
हर परिधि के पार
सहज विस्तार का आलिंगन करती धड़कनों में
वह सुन रहा था
अपने होने का संगीत
कण कण में

उम्र बढ़ रही थी
हर क्षण 
पर उसे आधार दे रहा था
एक समयातीत सत्य



वह मगन था
क्षितिज का स्पर्श करती ललाई में
मौन उसका
निराकार की धुन सुनता
सुना रहा था
निश्छलता के सौंदर्य में भीगा
नित्य नया होता गीत

वह रच रहा था
अपना अक्षय रूप
अक्षर अक्षर
तिरोहित क्षरित भाव

वह था
पर नहीं था
था तो बस एक वह
जो होता है
नित्य 
होने और न होने से परे

कृतकृत्य
पूर्ण
तृप्त
एकमेक सकल व्योम के साथ


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जुलाई ८ २०१५

No comments:

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...